मेरा भारत महान

अंधेरा कितना भी गहरा हो, एक छोटा सा दिया भी उसे खत्म कर देता है !! आए भारतीयता का दिया जलाए !!

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RASHID - "गर्व से कहो हम भारतीय है"


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आतंकवाद का धर्म और रंग !!

Posted On: 10 Jan, 2011  
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एक दुनिया खत्म हो गयी !!

Posted On: 8 Dec, 2010  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

संदीप भाई,, आपकी बेहद संतुलित प्रतिक्रिया पा कर बहुत ख़ुशी हुई ! यह बात सही है की मुस्लिम समाज के कई लोग बहुत शोहरतयाफ्ता लेकिन अधिकाँश भारतीयों की तरह इस वर्ग का बड़ा हिस्सा २ वक़्त की रोज़ी रोटी के लिए जूझ रहा है, सिर्फ चंद लोगो के अपराध को पुरे समाज से जोड़ दिया जाता है बस यही मेरी शिकायत है , आप देखे कैसे अपराधियों और आतंकवादियो को "आपकी बिरादरी" के कह कर संबोधित किया गया है, इस में उनका दोष नहीं है बल्कि आप देखे की कोई घटना होई नहीं की मीडिया का एक वर्ग और कुछ बुद्धिजीवी सीधे सीधे इस समुदाय को निशाना बना लेते है और समुदाय से होता हुआ यह निशाना धर्म , धार्मिक ग्रन्थ और उसके भी आगे जाने लगता है जबकि यदि नाक्साल्वाद या माओवाद आदि के kaarnamo को मीडिया उतना नहीं उछालता है ! जहाँ तक आरक्षण की बात है तो यह तो होना ही नहीं चाहिए आप कमज़ोर वर्गो के लिए फ्री कोचिंग खोले, उनको आगे बढाए, जितना हो सके तैयार करे ना की आरक्षण दे कर दुसरे वर्ग में हताशा और निराशा फैलाए, लेकिन वोट बैंक के चलते क्या कोई दलितों और पिछडो के इस आरक्षण को रोक सकता है, रोकना तो छोड़े कोई नेता ऐसे बयान भी देने को तैयार नहीं होगा !!

के द्वारा:

राशिद भाई, जय हिन्द ! आपका आलेख पढ़ा । नीचे लिखी प्रतिक्रियाएँ एवं उन पर आपके जवाब भी पढे । चूंकि मैं ऐसा कुछ न तो कभी सोचता हूँ और न ही कहता हूँ लेकिन आपके आलेख और शायद आपके विचारों ने भी मुझे इस पर प्रतिक्रिया देने पर विवश कर दिया है । आपने आलेख में जिस मार-काट की बात की है उसमे सिर्फ मुस्लिमों (या हिन्दू भी) ने ही अपनी जान नहीं गंवाई बल्कि उस मज़हब से पहले वो सब भारतीय थे और रही बात आज के मुस्लिम समाज की....तो आज आप किसी भी क्षेत्र में देखिये..... चाहे सिनेमा के क्षेत्र में शाहरुख, सलमान या आमिर ख़ान हों या अभिनेत्री कैटरीना कैफ हों...... या खेलों में ज़हीर खान, मोहम्मद अज़हरुद्दीन, इरफ़ान या यूसुफ़ पठान या सानिया मिर्ज़ा हों...... या राजनीति में भी बहुत से राजनेता जैसे शाहनवाज हुसैन (और भी बहुत से ) एवं पूर्व राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम जी हों......सभी इस्लाम में आस्था रखते हुए तथा अपने कर्म को करते हुए शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचे हैं । आपको ऐसे अनेकों उदाहरण मिल जाएँगे । रही बात मुस्लिम-आरक्षण की.....तो देश का एक प्रबुद्ध नागरिक होने के नाते आपको देश में जातिगत या धर्म के आधार पर आरक्षण की वकालत न करके इसे आर्थिक आधार पर (अगर आवश्यकता हो तो ) लागू करने का सुझाव रखना चाहिए । किसी भी जाति या धर्म से संबंध रखने से पहले हम इंसान हैं, भारतीय हैं । इसलिए आपसे आशा करता हूँ कि आप इस संकीर्ण मानसिकता से बाहर आकर अपने ज्ञान एवं अनुभव को भेदभाव के तराजू में न तोलकर अपनी सोच को ऊंचा रखने का प्रयास करें । इसी कड़ी में 'स्वर्गीय विवेक शौक़' जी की चंद पंक्तियाँ आपके साथ साझा करना चाहूँगा.....आशा है कि ये आपको मानसिकता दृढ़ता प्रदान करने में सहायक होंगी...... . . मस्जिद तो जीती हमने लेकिन, खाली ईमान गंवा बैठे, मंदिर तो बचाया लड़-भिड़ कर, खाली भगवान गंवा बैठे ॥ आपस में कुछ यूं लड़वाया हमको, मज़हब के ठेकेदारों ने, कि क़ाज़ी और पंडित ज़िंदा थे, हम अपनी जान गंवा बैठे ॥ तरक्की हमने इतनी की, कि हम चाँद-सितारों तक पहुंचे, मगर अपने होशों को खोकर, खाली इंसान गंवा बैठे ॥ सरहद जब-जब भी बंटती है, दोनों नुकसान उठाते हैं, हम पाकिस्तान गंवा बैठे, वो हिंदुस्तान गंवा बैठे ॥ . . बहुत-बहुत आभार आपका !! :) http://sandeepkaushik.jagranjunction.com/

के द्वारा: संदीप कौशिक संदीप कौशिक

निशा जी बात आपकी ठीक है लेकिन इतिहास की गलतियों की सजा वर्तमान से लेने कहाँ तक जाएज़ है , क्या और तालाबो में कोई गन्दी मछली नहीं है, क्या मुस्लिम समाज की समस्याए भी वही नहीं है जो देश में रहने वाले अन्य वर्ग की है ,, कुछ दिनों पहले BBC पर एक रिपोर्ट थी जिसमे दर्शाया गया था की भारत विरोधी जसूसियो में १९४७ से आज तक पकडे गए लोगो में ९५% अन्य वर्गो से थे फिर सारे इलज़ाम एक समुदाय पर ही क्यों ? एक सिख आतंवादी भुल्लर की फाँसी भी आज तक लटकी है तो क्या कोई इसको पुरे सिख समाज से जोड़ कर देखता है, नहीं तो फिर अफज़ल गुरु आदि को पुरे समाज से क्यों जोड़ा जाता है ?? विकास भाई का कहना सही है की सोच बदलनी होगी और वह भी सब को !!

के द्वारा:

विकास भाई,, यदि आप आकडे देखे तो आप को मुस्लिम समाज का प्रतिनिथित्व बहुत कम मिले गा सरकारी नौकरियों में, शिक्षा में इनका % भी बहुत कम है ! मुस्लिम समाज को reservation कुछ ही राज्यों में है ! जिस वर्ग को reservation का लाभ मिल रहा है वह सब को मालुम है बताने की ज़रुरत नहीं है जहाँ तक एक मुश्त वोट बैंक की बात है तो लगभग हर वर्ग का एक वोट बैंक है ! कांग्रेस का रूप तो सबके सामने है , मुसलमानों की हितैषी बन्ने वाली यह पार्टी महाराष्ट्र में १० साल से ज्यादा सर्कार में है लेकिन आज तक श्री कृष्ण आयोग की रिपोर्ट लागू नहीं किया,, वास्तविकता तो यह है की मुस्लिम समाज झूठे हमदर्दों के कारण गर्त में जाता जा रहा है , यह करते तो १ काम नहीं है लेकिन प्रचार इतना करते है की लगता है यही सब से बड़े हमदर्द है बीजेपी को इस बारे में मैं १०० % क्रेडिट दूंगा की कम से कम उनकी नीतिया खुली तो है ! विकास भाई सब वोट बैंक का खेल है आप बताये की जिस समस्या से बहु संख्यक समाज दो चार है उस ही से अल्पसंख्यक समाज भी , बेरोज़गारी, महंगाई, आतंकवाद, धार्मिक कट्टरता, नाक्साल्वाद, बिजली आदि समस्याए सबके लिए सामान है , और इसको ही ढकते के लिए समाज के दो बड़े वर्गो को आमने सामने खड़ा करने की मुहीम दोनों पार्टी करती है ताकि अपना वोट मज़बूत कर सके. तो सोच सबको बदलनी होगी और यह जब हो पायेगा जब हम आप की बात सुने और उसपे ग़ौर करें साथ साथ आप भी मेरी बातो को सुने और समझे. चले हम दोनों ही इसकी शुरुआत करे !!

के द्वारा:

रशीद जी यही बात तो मै कहना चाहता हुए की सोच सबको बदलनी होगी, आप जबतक ये सोचेंगे की कांग्रेस ही हमारा सुभ चिन्तक है तब तक कुछ नहीं हो सकता, अगर आप ये सोच रखेंगे की हम मुस्लिम है और हमारे साथ अन्याय हो रहा है ये भी गलत है, क्या आप को नौकरियों में आरक्षण नहीं मिल रहा है, क्या स्कूल में आप को आरक्षण नहीं मिल रहा है, बुरा मत मानियेगा लेकिन आप की ही समाज क्या हर उस समाज को जो पिचर है हमारे संबिधान में सामान्य लोगो से ज्यादा तरजीह दी जाती है आरक्षण आप क लिए एक एषा हथियार है जिसका इस्तमाल तो आप देश के टैलेंट के ऊपर भी चला देते है. ९९ फीसदी मार्कश लानेवाला बचा आप के ६० फीसदी मार्क्स लेन वाले बचे से हर जाता है आप का ६० फीसदी डॉ. या इन्गिनिअर बनता है और हमारा ९० % बेरोजगार फिर भी अगर आप के समाज की इस्थिति नहीं सुधरती तो इसमें देश के अन्य बर्ग क लोगो का क्या दोष है, जब आप का समाज अपने लिए एक ९०% अंक हाशिल करने वाला स्टुडेंट नहीं दे सकता तो इसमें देश का क्या दोष है, क्या कभी आप ने सोचा है की देश अपनी टैलेंट को आप के समाज के उत्थान के लिए हाश्तेय हुए कुर्बान कर देता है फिर भी उस महँ भारतीय समाज को आप का समाज अपना सबसे बड़ा दुसमन समझता है अब आप ही निर्णय लीजिये की सोच किस समाज को बदलनी चाहिए ? देश के बाकि समाज को? या खुद आप के अपने समाज को ? निर्णय आप खुद लीजिये देश से मत पूछिए कुछ पूछना है तो अपने समाज से पूछिए की क्या इतनी बड़ी क़ुरबानी देने वाले इस भारतीय समाज को आप का समाज कभी अपना मानता है ? अगर अपना मानता तो उसे आज ये सवाल करने की कोई जरुरत होती ? कुछ बुरा लगा हो तो जरुर माफ़ कर दीजियेगा क्यों की मै हिन्दू या मुस्लमान नहीं एक साचा भारतीय हु जो अपने पिच्रे भाइयो को आगे लेन क लिए न जाने अपनी खुशियों की कितनी क़ुरबानी दे चूका हु फिर भी आप के समाज का अगर कोई भाई ऐसी बात करता है तो बहुत दुःख होता है, आज जब पूरा देश भरष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा है इस भ्रस्त सरकार क खिलाफ कांग्रेस क खिलाफ तो जरा नजर उठा कर देखिये की क्या आप के समाज के वो रहनुमा जो अपने आप को आप का भगवन मानकर फतवा जरी करते है देश की इस जंग में सामिल होने क लिए कोई फतवा जरी किये है क्या? क्यों जब सारा देश एक है तो आप का समाज अलग होकर अपने आका कांग्रेस को मौन रूप से समर्थन दे रही है ? सोच किसको बदलना है रशीद भाई ये आप खुद सोचिये.? रही बात अफजल गुरु या कसब की तो निश्चित रूप से आप का समाज उनके लिए ढल है अगर नहीं भी है तो कैसे मानलू , भारत ने आप के समाज के एक सफल इन्शान को देश का राष्ट्रपति नियुक्त्य किया जो की आप के समाज के दुसमन पार्टी के कार्य कल में हुआ था और उस महँ पुरुष ने देश की संसद पे हमला करने वाले आरोपी की मौत की सजा के खिलाफ माफीनामा को लौटा दिया लेकिन इतने जघन्य अपराध करने वाले अपराधी की सजा को बरकरार रखने में उनके भी हाथ कप गए क्यों की वो सफल होते हुए भी आप के समाज के थे और अपने समाज के खिलाफ नहीं जा सकते थे. सच किसे बदलने की जरुरत है? बात बहुत है जिसमे सबको एक बार सोचना होगा?

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आप को लेख पसंद आया इसका शुक्रिया, आप ने हमारी बिरादरी के दो दिग्गज कह कर जिनको संबोधित किया है उनकी बिरादरी हमसे अलग है, पता नहीं क्यों आप लोग इस तरह के लोगो को पुरे समाज से जोड़ देते है , इस तरह के लोग तो हर बिरादरी में मिल जाए गे तो क्या आप ऐसे शब्दों का प्रयोग हर वर्ग के लिए करेंगे , मुझे तो याद नहीं किसी मुस्लिम संघठन ने इनके समर्थन में कोई मोर्चा निकाला हो या इन पर फूल परसाए हो ! जहाँ तक अटल जी की बात है तो उनसे मैं काफी प्रभावित हूँ और यदि आप को याद होगा तो जब वह गुजरात गए थे तो लगभग रो दिए थे वहां के कैम्पों का हाल देख कर , परन्तु उनकी पार्टी के बारे में मैं कुछ कहना नहीं चाहता हूँ !! यह सही है की कांग्रेस पार्टी का वोट बैंक एक अरसे तक मुस्लिम समाज रहा साथ साथ यह भी सही है की इस समाज को सब से ज्यादा नुकसान कांग्रेस ने ही पहुचाया है ! मैं आप की इस बात से भी सहमत हूँ की इस समाज को अपने दोस्तों और दुश्मनों की पहचान नहीं है , अगर होती तो इस हाल को न पहुचते ! हमे अपनी सोच बदलनी चाहिए यह भी एकदम ठीक है लेकिन साथ साथ और लोगो को भी हमारे बारे में सकारात्मक सोच अपनानी चाहिए , यदि अफज़ल गुरु या कस्साब को फासी नहीं दी जा रही है तो इससे मुस्लिम समाज का क्या भला हो रहा है या उनको क्या ख़ुशी मिल रही है , फिर क्यों इनको हमारे ऊपर लाद दिया जाता है ! यह हर तरह से साबित हो चूका है की मुस्लिम समाज सबसे खस्ता हाल और पिछड़ा हुआ है तो फिर हमारा तुष्टिकरण कहा हो रहा है ! जिन सुविधाओं का ज़िक्र आपने किया वह कहाँ जा रही है . बुनियादी स्तर पर तो कुछ नहीं दीखता है , जिहालत सब से ज्यादा, ग़रीबी सब से ज्यादा, पिछड़ा पण सब से ज्यादा तो तुष्टिकरण कहा है .... भाई साहब सोच सबको बदलनी होगी तभी कुछ भला होगा !! यदि किसी बात से दुःख पंहुचा हो तो माफ़ी चाहता हूँ !!

के द्वारा:

क्यों रशीद भाई आप भारत के मुस्लिम समाज है जिसकी आवाज़ को कोई नहीं सुनता और ना जिसके दर्द को कोई महसूस करता है !! क्या बात है आप तो वो समाज है जो एक खाश पार्टी के वोट बैंक है ये कैसे कह रहे है की आप की बात कोई नहीं सुनता. आप तो वोट बैंक है उसकी जो आप के बिरादरी के दो दिगज लोगो को आपके देशभक्त भाई अफजल गुरु और उनके विदेशी रिश्तेदार अजमल कसाब को राष्ट्रपति की तरह राष्ट्रीय सुरक्षा में अपनी दामाद बनाकर राखी है क्यों की ये लोग इस देश क मुसलमानों को तो नहीं मारे थे, वे तो देश की आत्मा पे हमला किये थे. और यह खातिर दरी सिर्फ आप के समुदाय का वोट बैंक लेने क लिए ही तो है. आप की बात वो पार्टी क्यों नहीं सुनती जिसके गोद में आप अपने को सुरक्षित महसूस करते है और सारा दुनिया जनता है की आप ने जो ब्रितंत अपने समाज का ऊपर सुनाया है उसके लिए वही पार्टी जिमेदार है, सता पाने के लिए हिंदुस्तान को दो तुक्रो में बटने वाली पार्टी, हिन्दू मुस्लिम को दो भागो में बटकर और हिदुस्तान पाकिस्तान दो देश बनाकर भाई को भाई का दुसमन बनाने वाली पार्टी जिसकी गोद में बैठने के बाद भी आप कभी महफूज नहीं रहे और फिर भी आप का समाज आज भी उसका सबसे बड़ा वोट बैंक है, और आप कहते है की आप की कोई आवाज नहीं सुनता. देश में ६ साल पंडित अटल बिहारी बाजपेयी की सर्कार रही जो की एक मुस्लिम बहुल संसदिये छेत्र का प्रतिनिधित्वा करते थे तो एक भी दंगा देश ने नहीं झेला, लेकिन जब भी आप की अपनी हितैसी पार्टी आई आप लोग की कितनी हिफाजत की ये तो आप खुद जानते है, आज देश में सबसे ज्यादा बिहार का मुस्लिम समाज सुरक्षित है क्यों की वो नदा के साथ है न की आप के कथित सुरक्षा देने वाली पार्टी के साथ, हा यहाँ भी आप की पार्टी ने आप के समाज के एक साफ सुथरे नेता को प्रदेश की बागडोर थमादी थी और उन्होंने १८० से ज्यादा मुस्लिम उमीदवार मैदान में उतारे थे आखिर १५% वोट है यहाँ आपका, लेकिन आप क समाज के लोगो ने उन्हें नकार दिया और आश्चर्य तो तब हुआ की किसी मुस्लिम बहुल चेत्र से कांग्रेस के मुस्लिम उमीदवार को हराकर बीजेपी का हिन्दू उमीदवार जीतता है जहा मुस्लिमो का निअनायक वोट है. और हा आप की आवाज कोई नहीं सुनेगा जबतक की आप की मानसिकता नहीं बदलेगी अपने दोस्त और दुसमन को तो कभी आप पहचान ही नहीं सकते, रस सिर्फ अयोध्या मंदिर मांगता है तो वो आप का दुसमन है और कांग्रेस राज करने क लिए आप का खून बहा कर उसपर सियाशत करता है तो वो आप का दोस्त. हद है आप और आप का समाज और ऊपर से आप का ये लेख, अपने समाज की सोच बदलिए खुद बा खुद दुनिया आप की आवाज सुनने लगेगी, अगर ऐसे ही किसी का वोट बैंक बन कर रहगये तो ऐसे ही लेख लिखियेगा. बुरा मत मानियेगा लेकिन सचाई यही है की जिसको जितनी सुबिधा मिलती है उसको उतना ही कम लगता है. खैर लेख क लिए धन्यवाद. बढ़िया लेख था लेकिन समाज की सोच भी बदलिए. जय हिंद

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 प्रिय राशिद भाई, जो हाल हिंदी का है प्राय: वही हमारी राष्‍टी्य भावना का है। पूर्वोत्‍तर ,दषिण हो अन्‍य क्षेत्रीय भाषाई राज्‍य। अनिवार्य होने पर फार्म में ही ' भारतीय' भरा जाता है। हिंदी का ब्‍यापक प्रसार राष्‍ट् भावना , भारतीयता का भाव बढाने में भी सहायक होगा।  भाई जी , आपका ई मेल मिला। गोरखपुर में मैं सामान के नजरिए से अकेले फकीरों जैसे रहता हूं। आवास पर कम्‍प्‍यूटर वगैरह नहीं है। आफिस में ही समय मिलने पर प्रतिक्रियायों वगैरह लिखता हूं। इस लिए नियमित नहीं रह पाता। रुचियों के बिषय भी सीमित होने से कभी कभी प्रतिक्रिया नहीं दे पाता। खानापूरी को' बहुत अच्‍छा लेख, बधाई' के सा उपस्थिति दर्ज करा देना अच्‍छा नहीं लगता। आफिस से मेल पर जवाब देने की स्थिति नहीं रहती।   -शंभू दयाल वाजपेयी, 9927003000

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सरकारी स्तर पे हिंदी को बढ़ावा देने की बात सोचना मूर्खता होगी क्योंकि अब हिंदुस्तान पर काले अंग्रेजों का कब्ज़ा है, और वो इसे कभी नहीं आगे बढ़ने देंगे. वक्त की जरूरत है की व्यक्तिगत आधार पर ही हमें हिंदी पढने पढ़ाने के क्रम को बढ़ाना होगा. मै अपनी बात बताता हूँ, अंग्रेजी को आज तक मैंने अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया है, जबकि पेशा गत कारणों से अंग्रेजी ही प्राथमिक भाषा है. लेकिन अंग्रेजी का मैं न्यूनाधिक प्रयोग करता हूँ. जब खुद के अंदर मजबूती होती है तो दूसरे को झुकना ही पड़ता है. कभी भी हिंदी को लेकर हीनभावना (inferiorty काम्प्लेक्स) मेरे अंदर नहीं आती है. जब परिस्थितियां विपरीत हैं तो रस्ते खुद ही बनाने होंगे. हिंदी की दुर्दशा अंग्रेजी के कारण नहीं है बल्कि हिंदी भाषियों की हीन भावना के कारण ही है.. इति शुभम

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वीरेंदर जी namaskar आप ने लेख पढ़ा इसके लिए आभार प्रकट करना चाहूँगा आप 100% सही है की आतंकवादी ही अपने धर्म को सबसे ज़्यादा बदनाम करते है और अपने धर्म के मानने वालों को सब से ज़्यादा नुकसान भी पाहुचते है , लेकिन इस शोर और बदनामी मे मीडिया का एक वर्ग भी क्यो शामिल हो जाता है यह सोचने की बात है ,, ज़िम्मेदारी तो यह होनी चाहिए की आप उस धर्म या वर्ग के उन लोगो को आगे लाये तो उदार वादी है और जो अच्छा पक्ष ज़ाहिर करे ना की धमाकेदार म्यूजिक और ग्राफिक्स का मसाला लगा कर डूबने वाले को एक धक्का और मार दे ! आप देखे की नक्सलवाद और माओवाद जो इस समय सबसे गंभीर खतरा है और सबसे ज़्यादा आतंकी घटनाओ को अंजाम देते है, मीडिया मे इतने छाए नहीं है जितना की मुस्लिम आतंकवाद या अब हिन्दू आतंकवाद ! बहरहाल मेरा मानना है की आतंकवाद सिर्फ आतंकवाद है उसका कोई धर्म नहीं है !! आतंकवादी धर्म का नाम लेकर अपने पाप छुपाना चाहते है चाहे वह इस्लाम का नाम ले चाहे हिन्दुत्व का या ईसाई सिक्ख का अब जहां समान नागरिक संहिता की बात है तो उसको लागू करे, आमजन को इसमे कोई एतराज़ नहीं होगा और ना ही उसपर कोई फर्क पड़ेगा क्योकी यह कानून सिर्फ पारिवारिक मामलो / विवाह / तलाक / वसीयत आदि के लिए ही है ! अब अगर राजनैतिक दल विरोध करे तो यह उनका अपना स्वार्थ है ! जहां तक कश्मीर की बात है तो भारत सरकार को हर संभव प्रयास करना चाहिए अब अगर उसके लिएधारा 370 हटाना ही ज़रूरी है तो बिल्कुल हतानी चाहिए !

के द्वारा:

एक और विचारणीय मुद्दा प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद..... सही बात तो यह है की हिन्दू... मुस्लिम.... सिख.... ईसाई ये सब सम्प्रदाय ही झगडे की जड़ हैं..... मुझे तो प्रतीत होता है इनसे बेहतर नास्तिक हैं जो कभी नहीं झगड़ते.... नास्तिकों के मध्य कभी विवाद नहीं हुआ..... लेकिन ये तथाकथित आस्तिक धर्म के नाम पर हमेशा तलवार निकल लेते हैं...... अगर ये हिन्दू... मुस्लिम.... सिख.... ईसाई धर्मों के मानने वाले इस तरह सम्प्रदायों में बातें हैं और एक दुसरे को अलग अलग समझते हैं.... तो इन सभी को आतकवादी कहना ही उचित होगा..... इस सम्बन्ध में महात्मा बुध्ध की नास्तिकता ही उचित प्रतीत होती है.... और वाही सत्य भी है..... ये सभी धर्म.... जो की वस्तुतः धर्म नहीं हैं..... एक आतंकवाद ही हैं.....

के द्वारा: HIMANSHU BHATT HIMANSHU BHATT

के द्वारा:

मुनीश भाई ,, राष्ट्र सब से पहले है और राष्ट्र हित से आगे कुछ नहीं है ,, एक जहाज़ है और हम सब उसपे सवार अब सोचे की अगर हर आदमी अपनी तरह जहाज़ को खीचेगा तो क्या होगा और अगर जहाज़ डूबे गा तो उस पे बैठने वाले हर सवार डूब जाएगा तो हर एक का पहला फ़र्ज़ जहाज़ को बचाना होना चाहिए ना की अपनी मर्ज़ी,, इस ही तरह हमारा वजूद देश से है अगर हम देश को पीछे ले जायेगे तो हम खुद भी तो गर्त में पहुच जायेंगे, राष्ट्रीय हित के मुद्दों को धर्म आदि से नहीं जोड़ना चाहिए, फिर मैं दोहराना चाहूँगा , जैसे माहोल कल था आज नहीं है जैसे आज है कल उससे और बेहतर होगा , लोग पढेंगे / समझदार होंगे / आगे बढ़ना चाहेंगे और यह ०.००९ % लोग कब ख़तम हो जायेंगे पता भी नहीं चलेगा !! राशिद

के द्वारा:

भई वाह रशीद भाई टिप्पड़ी का जवाब तुरंत ........ धन्यवाद. मेरा प्रश्न ये नहीं है की किसी राजनितिक दल ने सत्ता के लिए मुद्दों को क्यों छोड़ा, प्रश्न ये है की राष्ट्रीय मुद्दे होने पर भी जनता ने उन्हें समर्थन क्यों नहीं दिया, और सामान नागरिकता वाले मुद्दे में आपने स्वयं लिख दिया की भारत में विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं इसलिए इसके लिए ज़मीन तैयार करनी होगी, यानि धर्म के हिसाब से कानून यहाँ पर फिर राष्ट्र पर धर्म भरी हो गया........ ये मैं व्यक्तिगत आपके लिए नहीं कह रहा हूँ लेकिन जब तक मेरी - आपकी सोच मैं अपने धर्म को राष्ट्रीयता से पहले वरीयता दी जायेगी तब तक एक राष्ट्र का निर्माण तो संभव नहीं हाँ और कितने पाकिस्तान बन जाएँ ये कहा नहीं जा सकता.

के द्वारा:

मुनीश भाई ,, आप ने लेख को पढ़ा और टिपण्णी दी इसके लिए बहुत बहुत शुक्रिया ! जिन कारणों से देश की जनता को हिन्दू मुसलमान सिख आदि में बाटा गया वह शायद सब को मालुम है, रहा उन मुद्दों का जो सरकार में आने पर छोड़ दिए गए तो यह राजनीतिक दलो के लिए कोई नयी बात नहीं थी आखिर सत्ता की लालच में मुख्य मुद्दों को छोड़ा गया की नहीं, क्या यह बेहतर उदहारण ना होता की राष्ट्रवादी मुद्दों के लिए सत्ता छोड़ दी जाती ! जहाँ तक कश्मीर की बात है तो कश्मीर हमारा है और हमारे देश का हिस्सा है और रहेगा, देश में कई अन्य राज्यों को भी विशेष अधिकार प्राप्त है पर इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है हमको पूरा अधिकार है कश्मीर में तिरंगा फैलाने का और जो इस का विरोध करे उसका भारत में कोई स्थान नहीं है वह जहाँ चाहे जा सकता है लेकिन भारत में नहीं रह सकता ! सामान नागरिक संहिता आदि के लिए पहले ज़मीन तैयार करनी होगी क्यों की भारत में कई धर्मो और संस्कृतियों को मानने वाले रहते है और जो विशेष कानून उस धर्म या समुदाय के लिए है वह सिर्फ पारिवारिक / विवाह / वसीयत आदि के लिए मान्य है ना की आपराधिक मामलो के लिए इन मामलो में कानून सब के लिए समान है ! आप ने जो मैच की बात लिखी है १००% सच है मैंने भी अपने बचपन में ऐसी घटनाये देखी और कई बार भारत का समर्थन करने के कारण गालिया भी सुनी लेकिन अब वह वक़्त जा चूका है और अब कम से कम १०-१२ सालो से मैंने तो अपने शहर में ऐसा नहीं देखा ! मुनीश भाई देखिये रौशनी की किरण दिखाई देने लगी है हो सकता है यह हलकी हो लेकिन है तो हमे उम्मीद का दामन नहीं छोड़ना चाहिए, जो हाल कल था आज नहीं है और जो आज है वह कल नहीं होगा !! राशिद

के द्वारा:

प्रिय राशिद जी आपका कथन अक्षरशः: सही है, आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, ये बात भी सही है की आतंकवादी .०१% से ज्यादा नहीं होंगे, लेकिन फिर पूरा देश आतंकवाद से ग्रस्त है, कहीं न कहीं हम भारतीय भी प्रथम भारतीय न होकर हिन्दू मुसलमान सिख आदि हैं या मानते हैं क्यों.....? भारतीय संविधान की उद्देशिका में क्या कमी थी की बिना मतलब संशोधन कर उसमें, \"समाजवादी, पंथनिरपेक्ष\" आदि शब्द घुसाए गए, जैसे ही ये शब्द आये भारतियों ने अपने अलग अलग समाज में बाँट लिया और पंथ निरपेक्ष से पता चला की भारतियों के अलग अलग धर्म हैं, जो हमारा धर्म केवल भारतीयता होना चाहिए था वो न होकर हिन्दू, मुसलमान हो गया, क्यों हम भारतियों ने इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाई, क्यों......? आप लिखते हैं कुछ राजनितिक दल सत्ता में आये तो वो अपने किये वादे सामान नागरिकता, धरा ३७०, और राममंदिर आदि वो भूल गए, ये गलत तथ्य है, क्योंकि जो राजनितिक दल एक साथ एन डी ए में शामिल हुए वो इन मुद्दों को हटाने के बाद शामिल हुए और इन मुद्दों पर जनता ने कभी उस राजनितिक दल का समर्थन नहीं किया, चलिए राम मंदिर का मुद्दा तो १९८९ में राजनितिक तौर पर आया धार्मिक भी था परन्तु, अन्य मुद्दों पर जनता ने क्यों साथ नहीं दिया...क्यों? क्या अन्य दोनों मुद्दे गलत हैं एक राष्ट्र की दृष्टि से दोनों मुद्दे प्रासंगिक हैं, कश्मीर का अलग निशान( झंडा ) अलग विधान क्यों जनता ने स्वीकार किया..... क्यों ? वो तो भला हो डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जिन्होंने इसके खिलाफ आवाज उठाई अपना बलिदान दिया.... लेकिन आज फिर हम कश्मीर में झंडा नहीं फहरा सकते... क्यों... क्यों जनता गलत को गलत नहीं कहती........ कारण सिर्फ एक हम राष्ट्रीय मुद्दों को गौड़ मानकर धार्मिकता के आधार पर उनका निराकरण चाहते हैं......... कहीं न कहीं हम बटें हुए हैं......... एक छोटा सा प्रसंग में बहुत छोटा था. मेरठ में रहता था, एक बार भारत और पकिस्तान का क्रिकेट मैच हो रहा था और भारत मैच हार गया उसके बाद कुछ लोगों ने पकिस्तान के झंडे लहराए, मिठाई बांटी, और आतिशबाजी भी की, ये पाकिस्तान से कैसा प्रेम था, धार्मिक या राजनैतिक....... चलो कोई बात नहीं ऐसे लोग .०१% से ज्यादा नहीं होंगे लेकिन बाकी लोगों ने खासकर उनके समुदायों के लोगों ने उन्हें ऐसा करने से रोका क्यों नहीं...... क्यों? क्योंकि यहाँ भी धर्म आड़े आ गया......... हो सकता है आज के दौर में कुछ अंतर आया हो परन्तु ये .०१% हमेशा बाकी ९९.९९% पर भरी क्यों पड़ गए साफ़ है जिस देश का बटवारा धर्म के आधार पर हुआ हो और जनता आज तक नपुंसक बनी देख रही हो उस देश के नागरिकों के केवल धार्मिक दंश ही दिए जा सकते हैं और वो ही ये दंश हैं मुस्लिम आतंकवाद, हिन्दू आतंकवाद, सिख आतंकवाद. और ये सारे दंश केवल वो राजनितिक दल दे रहा है जिसने समाज को इतने वर्गों में बांटा है. अभी भी वक्ता है हिन्दू - मुस्लिम नहीं जरा भारतीय बनकर देखो साड़ी समस्याओं का समाधान हो जाएगा..............\" न समझोगे तो मिट जाओगे अ हिन्दुस्तान वालों, तुम्हारी दास्ताँ तक न होगी दास्तानों में.

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के द्वारा: kmmishra kmmishra

सलाम रशीद भाई, बात तो wikileaks ने कह दी. और सभी को मालुम चल गयी. लेकिन एक बात और है वह यह की हमारे बीच इतना फर्क क्यूँ है? अजी यह तो विदेशी है फिर भी उसके कहने को लोग मान लेते हैं. अगर यही बात अपने देश के लोग कहेंगे तो लोग इतना महत्त्व नहीं देते. आखिर क्यूँ? क्या होता अगर असान्जे ने ठीक इसका उल्टा कह दिया होता तो? सबसे पहले तो लोग एक दुसरे को जानें, भरोसा करें प्यार बढ़ाएं, अपना समझें. तो फिर हमें किसी तीसरे के बातों के तरफ देखने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. इन्हीं चीजों की कमी हमारे देश में काफी है. और रही बात मुस्लिमों की तो ज़रूर पिछड़े हुए हैं, उन्हें शिक्षा पर ध्यान देना ज़रूरी है. और असान्जे ने जो कहा के आतंकियों के साथ मुस्लिम समाज नहीं है तो वोह भी सही है. हाँ ऐसे लोग तो हर जगह होते हैं जो बुरे करते हैं. जैसे माँ, बाप, या और किसी को भी यह लोग जान से मार देते हैं. ऐसे लोगों के लिए अच्छा क्या और बुरा क्या? ऐसे ही लोग इन आतंकवादियों से जुड़ते होंगे. खैर सभी के सलामती चाहते हुए मैं जाता हूँ. खुदा हाफिज़

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राशिद जी, चार बार प्रतिक्रिया दे चुकी हूँ परन्तु कुछ एरर दिखा रहा है.शायद इस बार सफल हो सकूं.(फिर गया नेट) आपकी बात शत प्रतिशत सही है कि किसी भी समाज में एक प्रकृति के लोग नहीं हो सकते,यहाँ तक कि परिवार में भी .एक ही वातावरण में रहने वाले एक माँ की संतान भाई-बहन का स्वभाव एक दुसरे से विपरीत होता है.सद्भाव प्रेम का आधार देश को उन्नति की राह पर अग्रसर करता है. देश को नुक्सान पहुँचाने वाले,जो भी लोग हों उनकी भर्त्सना समाज में पक्षपात रहित हो कर सबको करनी चाहिए.देश समाज के शत्रुओं ,देशद्रोहियों को कठोरतम दंड का प्रावधान होना जरूरी है.जिस धरती पर हमारा जन्म हुआ है उस देश के प्रति हमारी निष्ठां सर्वोपरी होनी चाहिए.जाति-धर्म के भेद के बिना देश के हित को प्रधान मानना चाहिए. (३बर नेट परेशां कर चुका है अब भी.)

के द्वारा: nishamittal nishamittal

राशिद भाई , बहुत ही बढ़िया लेख लिखा आपने और बहुत सी सच्चाइयाँ बयां की, किसी भी समाज मैं 100 प्रतिशत लोग अच्छे नहीं होते और न ही 100 प्रतिशत लोग ख़राब होते है, बल्कि मेरा मानना तो ये है की अच्छे और बुरे होने का धर्म से कोई लेना देना ही नहीं, अच्छा इंसान अच्छा होता है, और बुरा इंसान बुरा होता है, चूँकि दुनिया का रिवाज ये है की पैदा होने के बाद हमें धर्म से जोड़ दिया जाता है, और जो अच्छे लोग होते है, वे अपने सत कर्मो से अपना और अपने धर्म का नाम ऊँचा करते है और जो बुरे लोग होते हैं वे अपने साथ - साथ अपने धर्म को भी शर्मशार करते हैं ! लेकिन सही शिक्षा और मार्गदर्शन से ही इंसान एक सच्चा नागरिक बनकर अपना और अपने मुल्क का नाम रोशन कर सकता है ! एक अच्छे लेख के लिए बधाई !

के द्वारा: allrounder allrounder

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संजय भाई ,, आप को लेख पढ़ कर संतोष हुआ यह जानकार बहुत खुशी हुयी !! जिस घटना की चर्चा आप ने की है वह बेहद दुख देने वाली है लेकिन भाई यकीन मानिए ऐसे लोगो की गिनती पूरे समाज मे शायद 0.0001 % से भी कम होगी इस तरह की बाते करने वाले अपने देश के दुश्मन तो है ही साथ साथ अपने मजहब के और अपने समाज के भी दुश्मन है , यह लोग उन ही लोगो के साथी और पैरोकार है जिन्हों ने कर्बला मे इमाम हुसैन को उनके 72 साथियो के साथ कत्ल किया था,, इनके नाम और वेश भूषा तो मुसलमानो जैसी हो सकती है लेकिन यही मुसलमानो के और इस्लाम के असली दुश्मन है ! यदि आप को समय मिले तो मेरा लेख "इस्लाम के असली दुश्मन कौन" देखिएगा जिसमे इन दुश्मनो को सामने लाने की कोशिश की है !! जहां तक भारत की बात है तो भारत का इस्लाम से बहुत नजदीक और गहरा रिश्ता है ,, इस्लाम के अनुसार पैग़ंबर आदम ( जिनहे आप मनु भी कह सकते है ) जिनसे मानव की उत्पत्ति हुयी उनका निवास स्थान भारत ही था ,, और यह भारत ही है जहां से धर्म की उत्पत्ति हुयी जिसे आप वैदिक धर्म या सनातन धर्म कह सकते है ( जब पहला मनुष्य वह आया तो निश्चय ही धर्म और संस्कृति की शुरुआत भी उस ही से हुयी होगी ) सारे धर्म इस ही से निकले , सारी संस्कृतिया इस ही से निकली है !! अब जहां तक हिन्दू और मुसलमानो का सवाल है तो भाई सच यह है की सैकड़ो सालो से यह दोनों मिलकर रह रहे है और इनको किसी तरह से भी अलग नहीं किया जा सकता चाहे कोई कितनी कोशिश करे ! बस ज़रूरत है दोनों मे संवाद बढ़ाने की ,, उन मुट्ठी भर लोगो को किनारे करने की जो नफरत फैलाते है और उस आम लोगों को आगे लाने की जो मेल मिलाप और भाईचारे की बात करते है !! यदि समय मिले तो मेरे अन्य ब्लॉग क्या इस्लाम वास्तव मे वैदिक धर्म का ही प्रसार है ??, हिन्दू और मुसलमान : कैसे करें इनको जुदा !! देखे ,, उम्मीद है इनसे आप एक आम मुसलमान की सोच समझने मे मदद मिलेगी !! राशिद http://rashid.jagranjunction.com

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प्रिय राशिद भाई, नमस्कार, आपने बिलकुल सही लिखा है कि ये गोरो के देश यदि भारत में रूचि रखते है तो केवल इस कारण की भारत एक बहुत बड़ा बाजार है जहां इनका कबाड़ व कचरा भी आसानी से खपाया जा सकता है। अन्‍यथा तो वे इस देश व अन्‍य एशियाई देशों को मुर्खो की जमात ही समझते है। भले ही वे अभी भारतीय दिमाग के बुते पर फलफूल रहे हैं। भारत को स्‍वाभिमानी भारत बनानें की जिम्‍मेदारी केवल युवाओं की ही नहीं है, हर भारतीय भले ही वह किसी आयु वर्ग का हो सभी की जिम्‍मेदारी है कि वह इस देश पर गर्व करें और गर्व से कहे कि यह देश मेरा है और मैं इस भारत माता का बेटा या बेटी हूँ । और राजनारायण बिसारिया जी के शब्‍दों में कहें कि - जो मॉं का सर मांगें उससे हाथ नहीं हथियार मिलाओं जो प्रपंच में पड़ा हुआ हो उसे कभी ना अपना पंच बनाओं । अरविन्‍द पारीक

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राशिद भाई नमस्कार । विकीलीक्स मामले पर और तमाम दूसरे सनसनीखेज मामलों पर लिखना चाहता था लेकिन व्यस्तताओं के कारण लिख नहीं पाया । आपका यह लेख पढ़ा तो दिल बाग बाग हो गया । ऐसा लगा जैसे यह लेख मैंने लिखा हो । मेरे और आपके भावों में बहुत समानता है । अमेरिका जैसे स्वार्थी और कमजोर देश (क्योंकि वह हर यु़द्ध हारा है । वह युद्ध तकनीकी से जीतना चाहता है अपने सैनिकों की वीरता और शहादत के बल पर नहीं) कभी किसी दूसरे देश का उत्थान नहीं देख सकता है । वह हमेशा अपने आर्थिक और सैन्य हितों को साधने में लगा रहता है । सयाने अमरीकी यह नहीं जानते कि अमेरिका को चलाने में भरतवंशियों का कितना बड़ा हाथ है । . जिस दिन भारत और चीन अमेरिकी डॉलर में निवेश करना बंद कर देंगे और अपना फालतू का विदेशी मुद्रा भंडार कम करने लगेंगे अमेरिका अर्थव्यवस्था टूट कर आयरलैण्ड और ग्रीस हो जायेगी । . जबरदस्त लेख के लिये आभारी हूं । यही क्रम बनाये रखिये । आपकी लेखनी में सोये हुओं को जगाने की ताकत है । जय हिंद ।

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बहुत अच्छे रशीद जी, आखिरकार बात सामने आ ही गयी. भारत को तो क्या अमेरिका जैसे देश अन्दर ही अन्दर इस जैसे किसी भी देश को आगे बढ़ने नहीं देंगे. उसे डर है की कही वोह पीछे न हो जाए. लेकिन हम भारतीय बड़े देश के पीछे लगे रहे. भाई जब तक आप खुद बड़े न हों कोई आपको बड़ा नहीं बना सकता. अपनी ताकत पर ही भारत कामयाब होगा. अमेरिका के इरादे तो शुरू से ही हर देश के लिए नापाक रहा है. एक तरफ अफगानिस्तान को बरबाद किया, तो इराक को तबाह किया., वहीँ पाकिस्तान को सहायता पहुंचाकर अप्रतक्ष्य रूप से भारत पर उसने हमला ही किया है. और ऐसा नहीं है की उसने पाकिस्तान की लिए अच्छा सोच रखा है. वोह उसे भी लूटेगा और बर्बाद करेगा. पाकिस्तान भलाई चाहता है तो उसे अपने पड़ोस के हर मुल्क से बेहतर रिश्ते बनाने होंगे. क्यूंकि मुसीबत में पडोसी ही काम देते हैं. आज जब अन्साजे ने इसका खुलासा कर दिया तो अब उस पर बलात्कार का आरोप जड़ उसे हिरासत में लेने की कोशिश शुरू हो चुकी है. ताकि किसी तरह इन सब खुलासों को झुठलाया जा सके.नहीं तो गोरों की देश में तो लडकिय कौड़ियों के भाव बिकती हैं बलात्कार करने की जरुरत कहाँ से हो गयी. वोह भी ठीक इसी समय. आज भारत को जरुरत है अपने खुद के मेहनत की. दुसरे के तरफ मुंह उठा के देखने से कुछ फायदा नहीं होगा. और अमेरिका जैसे देशों की तरफदारी और भ्रष्टाचार करनेवालों पर जोर का लगाम लगाना चाहिए. अमेरका से सौदा करते समय यह तो ज़रूर जानलें की अमेरिका जितना का बाबू नहीं उससे ज्यादा का झुनझुना पकड़ा देता है. अपने भारत को खुद पर भरोसा कर के आगे कदम बढ़ाना चाहिए. ताकि धोका ना हो.

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बात सिर्फ़ दवाओं तक ही सीमित नहीं है राशिद जी, दवाओं के बारे में तो स्पष्ट ही है कि जो दवा अमेरिका और पश्चिमी देशों में बैन्ड होती है, उन्हीं देशों की बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियां तीसरी दुनिया के ग़रीब या विकासशील देशों में बड़े पैमाने पर उत्पादन या निर्यात कर अरबों बटोरते हुए वहां के नागरिक-स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करती ही रही हैं । पिछले विश्वयुद्ध में दुश्मन देशों को तबाह करने के लिये मित्रराष्ट्रों के यहां जो खतरनाक़ आयुध तैयार होकर अनुपयुक्त पड़े रह गए थे, एक षड्यंत्र के तहत भारत और दूसरे पिछड़े देशों से अमानवीय क़रार करते हुए उन आयुधों के खतरनाक़ रसायनों का ही कीटनाशक तैयार कर इन देशों को महंगे दामों में बेचने जैसा जघन्य कृत्य भी अमेरिका और पश्चिमी देश करते रहे हैं । उन्होंने एक तीर से तीन शिकार किये । पहला कि खतरनाक़ रसायनों के कचरे से उन्हें छुटकारा मिला, दूसरा कि कुटिल प्रचार कर उन्होंने कीटनाशक बेचकर अरबों खरबों की कमाई कर अपने आयुधों पर हुए खर्च से कई गुना वसूल किया, और तीसरा कि हमारी मिट्टी इन कीटनाशकों की एडिक्ट हो चुकी है, जैसे कोई आदमी ड्रग एडिक्ट हो जाता है । सबसे बेहतरीन कीटनाशक गोमूत्र या पशुओं के मूत्र से तैयार किये जा सकते हैं । ये शून्य टेक्नोलोजी के साथ ही मानव स्वास्थ्य के लिये निरापद भी हैं । परन्तु भ्रष्ट तंत्र ने अपनी स्वदेशी तकनीक विकसित करने की बजाय बाहर की कम्पनियों से भारी कमीशन लेकर क़रार करते हुए न सिर्फ़ अपनी जनता और मिट्टी के साथ विश्वासघात किया, बल्कि पूरे देश की मिट्टी भी खराब कर दी । कहा जाता है कि उन्हीं रसायनों का इस्तेमाल विदेशी उर्वरकों में भी किया जाता रहा है । श्री राजीव दीक्षित जी अपने अभियान में इन्हीं सच्चाइयों की पोल खोलते घूम रहे थे, जो आज हमारे बीच से एकाएक ऊपर उठ चुके हैं । साधुवाद ।

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राशिद जी, अमेरिका की दोगली निति के बारे में तो सब अच्छी तरह जानते है बस जो नहीं जानता वोह है हमारी बेचारी मासूम सी सरकार .... अमेरिका हमेशा ही भारत आकर अच्छी अच्छी बातें कहता है और वापस जाते ही रंग दिखा देता है .......... अब अमेरिका का क्या भरोसा करना ये तो थाली का बेगान है कभी इदर तो कभी उधर ......... अब अगर हमारे राजनेता लोग ही कुछ न समझना चाहे तो क्या कर सकते है .. युवा भी कैसे आगे ए उन्हें भी तो आगे आना को कोई मौका नहीं दिया जाता ..... और युभी आजकल परिवारवाद का ही बोलबाला है ... अब हमारे देश को बस झूठे वादे लेने की और करने की आदत पड़ गयी है ....... और कहते है न इंसान मर जाता है पर आदत नहीं ..... अब इनके बारे में जितना बोलू कम है ........

के द्वारा: roshni roshni

राशिद जी, विकीलीक्स के खुलासे में भारत के लिये अमेरिकी सोच और नीतियों का जो प्रकाशन हुआ है, सच पूछिये तो उसके निहितार्थ पूर्व में भी अमेरिका की कथनी और करनी में अंतर के माध्यम से देश के सामने रहे हैं । सारी दुनिया जानती है कि अमेरिका सिर्फ़ अपना खुद का ही हितैषी है, और किसी का नहीं । हां, विकीलिक्स से पूरी दुनिया को यह फ़ायदा अवश्य हुआ है, कि अपना हित साधने के लिये अमेरिका किस स्तर तक गिर सकता है, या और किसका क्या-क्या नुकसान कर सकता है, इसपर से कुछ पर्दे अवश्य उठे हैं । यह भी एक तथ्य ही है कि भारत को जो कुछ भी हासिल करना है, अपने बूते पर ही करना है । अमेरिका या भगवान भी उसी की मदद करते हैं, जो पहले अपनी मदद खुद करता है । साधुवाद ।

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राशिद जी, निश्चय ही प्यार ऊपर वाले की बख्शी हुई ऐसी नेमत है, जिसपर दुनिया के वज़ूद की बुनियाद खड़ी है । परन्तु प्यार है तो एक भावना ही । ऊपर वाले ने ही अपने सांसारिक नियमों के तहत मनुष्य के लिये कर्त्तव्य को भावना से ऊंचा दर्ज़ा दे दिया, इसलिये कर्त्तव्य के लिये प्यार को क़ुर्बान होना ही पड़ता है । आपको ऐसी ढेरों मिसालें मिलेंगी, जिसमें पुरुष की तो बात ही छोड़ दीजिये, कन्याओं ने अपने फ़र्ज़ के लिये खुद के अरमानों का गला घोंट दिया । मैं एक ऐसी महिला को जानता हूं, जिन्होंने भरी जवानी में पिता की मौत के बाद दो छोटी बहनों एवं अपंग भाई के लिये अपना विवाह नहीं कर भाई बहनों को पढ़ाया-लिखाया, उनकी शादियां कीं, तथा आज भी अपंग भाई के साथ ही जीवन-यापन करती हुई उम्र की शाम काट रही हैं । साधुवाद ।

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प्रिय राशिद भाई, अपनी ताजा पोस्‍ट की कुछ पंक्तियां आपकी इस पोस्‍ट पर टिप्‍पणी के लिए प्रस्‍तुत कर रहा हूँ .... क्‍या घोटालों, भ्रष्‍टाचार को पूरी तरह मिटाना संभव है? भ्रष्‍टाचार हमारा राष्‍ट्रीय चरित्र बन गया है। हम गांधी जी के बंदर बने बैठे हैं, न तो बुरा देखते हैं, न बुरा बोलते हैं और न ही बुरा सुनते हैं – इस प्रकार हम अप्रत्‍यक्ष रूप से भ्रष्‍टाचार का समर्थन करते हैं। क्‍या यही भ्रष्‍टाचार की असल जड़ नहीं हैं कि हम जान कर भी अनजान हैं। आपने सही लिखा है कि हम जिस कश्‍ती में बैठे है उसी में छेद कर रहे हैं बिना यह सोचे कि यह कश्‍ती डूब जाएगी । लेकिन निराशा से क्‍या हासिल है । उम्‍मीद पर दूनिया कायम है । एक अच्‍छा लेख बधाई । - अरविन्‍द पारीक

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रशीद जी नमस्कार ,आज हमारा देश कई मोर्चो पर लड़ रहा हैं. आंतरिक हो या बाहरी सभी तरफ से भारत को खतरा हैं. नक्सलवाद ,गरीबी. बेरोजगारी ,अशिक्षा ,आतंकवाद से आज हम जूझ रहे हैं. लेकिन इन में से नक्सलवाद गरीबी बेरोजगारी हमारी भ्रष्ट व्यवस्था की देन हैं. अशिक्षा के कारण भी लोग नक्सलवाद की तरफ बढ़ रहे हैं. लेकिन नक्सलवाद के बढ़ने का सबसे बड़ा कारण भ्रष्ट व्यवस्था हैं. हमारी न्याय प्रक्रिया में देरी के कारण भी यह बढ़ता जा रहा हैं. स्पस्ट हैं की असंतोष बढ़ने के परिणाम स्वरुप नक्सलवाद बढ़ता जा रहा हैं. कभी फुर्सत मिले तो मेरे पढ़े और अपने उतम विचारो से मुझे अवगत करावे. आपने अति महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया हैं. बधाई. www.amitkrgupta.jagranjunction.com

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चातक भाई,, बहुत दिनों क बाद आप की कमेन्ट अपने लेख पर देखी, बहुत ख़ुशी हुयी,, भाई न विदेशी आक्रान्ताओं के पाप गिनाने से देसी लुटेरो के पाप कम होंगे और न देसी लुटेरो के पाप बताने से विदेशी आक्रान्ताओं के, दुःख तब होता है जब अपना कोई धाव देता है, अगर कोई बाहरी व्यक्ति घर में तोड़ फोड़ करके जाये तो अपने लोग सांत्वना देते है, लेकिन जब अपना भाई ही धाव लगाये तो मरहम कौन देगा ? जब तक आज़ाद नहीं थे तो कम से कम यह उम्मीद थी की यह फिरंगी / लुटेरे कभी न कभी तो जाएगे अब क्या उम्मीद है ? फिर एक जो बहुत अहम् बात वह यह है की मंत्री से लेकर संतरी सब पैसा बनाने में जुटे है जहाँ एक मंत्री १५ करोड़ मांगता है वहां एक सिपाही ५० रुपये की वसूली करता है,, मेरी नज़र मे दोनों बराबर के दोषी है ज्यादातर देखा गया है की आम जनता भी तब तक ही ईमानदार है जब तक आम है जहां उसका चयन किसी अच्छी नौकरी मे हुआ बस रिश्वत का सिलसिला शुरू हो गाता है और वह आम आदमी खास हो जाता है और आम जनता का शोषण करने लगता है तो कहीं ऐसा तो नहीं है की हजारो साल की गुलामी ने हमारी मानसिकता को सिर्फ दो वर्गो मे सीमित कर दिया "शोषक" और "शोषित" , हर शोषित खास होने पर "शोषक" बन जाता है !! अगर मेरी कोई बात बुरी लगी हो तो माफ कर दीजिएगा !! राशिद http://rashid.jagranjunction.com

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\"अगर पिछले साठ सालो के घोटालो और स्विस बैंक मे जमा राशि को जोड़ दे तो शायद यह राशि इतनी बड़ी होगी कि जिन विदेशी आक्रमणकारिओ ( गजनावी, गौरी , अंग्रेज़ आदि ) को हम दिन रात कोसते है और कहते है कि हमारा देश सोने कि चिड़िया था और इन विदेशियो ने उसे लूट लिया, सब बौने नज़र आएगे,, उनहोने तो दुश्मन देश मे सब किया लेकिन यह देसी लुटेरे तो अपना घर ही लूट रहे है !!\" प्रिय रशीद जी सदर नमस्कार. यह रकम सिर्फ स्विस बैंक में जमा है. स्विस बैंक जैसे एक दर्ज़न और बैंक हैं जो की काले धन को जमा करते हैं .. अभी उनके यहाँ जमा रकम का कोई ब्यौरा नहीं है. अब वक्त आ गया है जब हमें इनसे हिसाब मांगना चाहिए . हम सअब को कमर कस लेनी है इस रुपये को भारत लेन की . आभार.

के द्वारा: kmmishra kmmishra

राशिद जी, धर्म, भाषा, जाति और क्षेत्र में बांट कर जनता को उलझाए रखने का खेल भी इन लुटेरों का ही कुचक्र है, ताक़ि जनता का ध्यान इनकी लूट की तरफ़ जा ही न पाए । महंगाई बढ़ाने का खेल भी इनकी सोची-समझी रणनीतियों का ही हिस्सा है, जिससे दाल-रोटी की जुगाड़ में ही अपनी कमर तुड़वा रही पब्लिक इतनी अशक्त रहे कि संगठित होने की प्रवृत्तियां ही न पनप सकें । बेरोजगारी बरक़रार रहे ताक़ि टके सेर के भाव में झंडा ढोने वाले और ट्रकों में भरकर रैलियों में पहुंचने वाले नौजवानों की कभी किल्लत न बन पाए । भूखे-नंगे लोग एकाध हरे नोट और झड़े कम्बल पर भी वोट बेचने के लिये हमेशा तैयार मिलें । सारी नीतियां अंग्रेज़ों की बिरासत हैं, और सभी पार्टियों के कर्णधार एक ही थैली के चट्टे-बट्टे । जो लूट के राज़दार होते हैं, उन्हें साझेदार बना लिया जाता है, तो फ़िर विरोध कौन करेगा । जांच समितियों की रिपोर्टें या तो खरीदकर प्रभावित कर दी जाती हैं, या फ़िर दबा दी जाती हैं । जब हमारा आपका केस मुक़दमा तीस चालीस साल में खत्म नहीं हो पाता, पीढ़ियां तक लड़ती हैं, तो इन थैली वालों के खिलाफ़ केस में क्या जान दौड़ पाएगी? समूल आपरेशन ही इस कैंसर का इलाज है, जो अब किसी स्वत:स्फ़ूर्त क्रांति से ही संभव है । क्योंकि जनता इतने धड़ों में बांटी जा चुकी है कि संगठित कर पाना नामुमकिन सा ही है । साधुवाद ।

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भाई राशिद जी इन नेताओं की फितरत ही यही है. क्यूंकि हम चुनाव ही गलत करते हैं. आज देश में इतना कुछ है की उसी से देश अच्छी तरह से चल सकता है. इसीलिए आज हमें चालाक नेताओं से ज्यादा अच्छे नेताओं की ज़रूरत है. चालाक तो हमेशा से हैं और हर बार ठग जाते हैं. अच्छा होता इन देश के गद्दारों की एक लिस्ट बना कर इन्हें जेल में ठूंस दिया जाता. लेकिन जैसा की हम सभी जानते हैं के बड़े लोगों का तो कुछ जल्दी होता नहीं. और कुछ मामलों में तो दोष साबित करते करते दोषी खुद ही अपनी ज़िन्दगी जी कर मर जाता है. देश के लोगों में अगर इमानदारी जाग जाए तो तकदीर को हम तदबीर से बदल देंगे. और जैसा के आपने कहा " हमारे लिए देश और भ्रष्टाचार से बड़ा है धर्म, भाषा, जाति, क्षेत्र !" बिलकुल लोग ऐसा कर रहे हैं. हमें एक बात तो साफ़ समझ लेनी चाहिए की जो लोग गलत कर रहे हैं वोह धार्मिक कैसे? फिर उनका साथ क्यूँ देना? अगर इन गद्दारों को सजा मिलने लगे तो जनता का भरोसा जागेगा. बस हम कदम उठा के तो देखें.

के द्वारा: jalal jalal

–जब बात भ्रष्टाचार की हो या रिश्वत की हो देश -प्रदेश के सारे समाचार पत्र – टी वी चैनल रात दिन उसी समाचार से भरे रहते है — और रोज नये -नये घोटालो का खुलासा होता रहता है – इसी श्रेणी में दो दिन पहले बहुत बडे उद्धोगपती रतन टाटा ने राह्स्योदघाटन किया की 90 के दशक में किसी केंद्रीय मंत्री ने उनसे 15 करोड रुपये की रिश्वत विमान सेवा शुरू करने के लिये मांगी थी—- फिर खबर आई की योग गुरु बाबा राम देव से भी किसी उत्तराखंड सरकार के मंत्री ने दो करोड रुपये की रिश्वत मांगी थी किसी ट्रस्ट में सहायता करने के लिये – इससे तो ऐसा लगता है की हमारे देश में कोई भी व्यापार -उद्योग , ट्रस्ट शुरू करना हो तो बिना रिश्वत दिये सरकारी मान्यता नही मिल सकती | अब सबसे बडा सवाल यह है की क्या जो उद्योग – व्यापार , धार्मिक – न्यास , ट्रस्ट आदी स्थापित हो चुके हैं उन्होने भी रिश्वत दे कर मान्यता प्राप्त की थी | इसलिये और लोगो से तो नही केवल इन दो बडी हस्तियो से देश हित में और जन हित में यह अनुरोध है की यह लोग आगे आयें और अपने स्थापित हो चुके किसी भी व्यापार – संस्थानो के लिये अगर कोई रिश्वत अगर दी थी तो उसका खुलासा करे----केवल चिल्ला - चिल्ला कर देश में भ्रम की स्तिथि पैदा नहीं करनी चाहिए - पर देखने में यह आता है की भ्रष्ठाचार करने वाला ही भ्रष्ठाचार के विरुद्ध अधिक चिल्लाता है --- अच्छे लेख के लिए बधाई

के द्वारा: s p singh s p singh

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अयोध्या फैसला- अल्लामा इक़बाल की कविता के माध्यम से एक पैगाम तुलू-ए-इस्लाम अल्लामा इक़बाल हवस ने कर दिया है टुकड़े टुकड़े नौए इन्साँ को Human greed has torn the human race into pieces उखुव्वत का बयाँ हो जा, मुहब्बत की ज़ुबाँ हो जा Be the declaration of fraternity, become the language of Love गुबार आलूदह ए रंगो नसब हैं बाल ओ पर तेरे Your wings and plumage are polluted with race and color’s dust तू अय मुर्ग़े हरम।. उड़ने से पहले पर फ़िशाँ हो जा O Haram’s bird29 flutter your wings before you become ready for flight ब्राहीमी नज़र पैदा मगर मुश्किल से होती है It is however difficult to develop Ibr«hâm’s vision हवस छुपछुप के सीनों में बना लेती है तस्वीरें Greed creates subconscious images stealthily in the vision! तेरे इल्मो मोहब्बत की नहीं है इन्तेहा कोई The bounds of your Knowledge and Love are none नहीं है तुझ से बढ़ कर साज़े फ़ितरत में नवा कोई Melody sweeter than you in the Divine orchestra is none! तेरे सीने में है पोशीदा राज़-ए-ज़िन्दगी कह दे Concealed within your heart is the secret of life मुसलमाँ से हदीस-ए-सोज़ ओ साज़े ज़िन्दगी कह दे Relate to the Muslim the traditions of pathos of life यक़ीं मुहकम, अमल पैहम, मुहब्बत फ़ातेहे आलम Firm Faith, constant struggle, Love, conquest of the universe जिहादे ज़िन्देगानी में है ये मर्दों की शमशीरें These are the swords for the brave men in the battle of life तू राज़े कुन फ़काँ है अपनी आंखों पर अयाँ हो जा You are the secret of Kun Fik«n 28, be manifest to yourself खुदी का राज़दाँ हो जा, खुदा का तरजुमा हो जा Become the knower of the secret of Khudâ, become interpreter of God मसाफ़े जिन्दगी में सीरते फौलाद पैदा कर In the battle of life acquire the nature of steel शबिस्ताने मोहब्बत में हरीरों पर नियाँ हो जा In the Love’s bed-chamber become soft like silk30 खुदी में डूब जा ग़ाफ़िल।. ये सिर्रे ज़िन्दगानी है O imprudent one! Dive in Khudi, , this is the secret of life निकल कर हल्का ए शामो सहर से जाविदाँ हो जा Relinquishing the narrow confines of time become eternal -तनवीर अहमद गजाली

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रशीद जी जब आप जैसे प्रगतिशील विचारधारा के युवा मैदान में आ रहे हैं, और उस समाज में, जहां मुंह पर ताले लगे होते थे, ताल ठोंककर बोलने की हिम्मत कर ली है, तो यक़ीन जानिये अब कुछ भी गलत नहीं होने वाला । कहने और उकसाने वाले दोनों तरफ़ कम नहीं हैं, लेकिन फ़फ़ोलों के दाग आज भी जिनके सीनों पर हैं, चाहे हिन्दू हों या मुसलमान, उन्हें आज सिर्फ़ इस सच्चाई से सरोकार है कि इस बेवज़ह की हुज़्ज़त से सिर्फ़ तनाव, लाठियां और गोली मिली है, घर उजड़े हैं, और मुल्क़ भी बर्बाद हुआ है । नतीज़ा कुछ निकलना नहीं है । जो हो सकता था, वह बेहतर से बेहतर हुआ है । ऐसा कि आज सभी स्वीकार न कर रहे होते, तो देश में राहत न होती । बस इसी तरह हर स्तर पर विवेकशील और व्यावहारिक बातें होती रहें, दोनो तरफ़ के प्रतिक्रियावादियों को करारा जवाब अपने आप मिल जाएगा धन्यवाद ।

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राशिद भाई.. यह भारत देश की मिटटी जिस महान सनातन परंपरा की वाहक है ...वह आपके शब्दों में अपने अस्तित्व का आभास दिलाती है .. सनातन परंपरा हिन्दुओ की कॉपीराईट नहीं है .. बल्कि यह यहाँ की मिटटी , हवा , पानी , आग और जीवन शैली ..इस राष्ट्र के कण कण में रची बसी है .. और यहाँ सास लेने वाला हर इंसान उससे प्रभावित रहता है... . हा हिन्दू सौभाग्यशाली है की इस सनातन परंपरा को जी रहे है ... और मुसलमान , सिख ,ईसाई सभी भाग्यशाली है की वे इस महान परंपरा में सांस ले रहे है... जो सिर्फ और सिर्फ समरसता ,, सामाजिकता सिखाती है... और वही भाषा जनाब एसयू खान की टिप्पणी में दिखती है जब वे कहते है की भारतीय मुसलमान विश्व को इस्लाम का सही अर्थ बताने में सक्षम हैं।” और “भारतीय मुसलमान ऐसी सर्वोत्तम स्थिति में हैं कि वे मौजूदा प्ररिप्रेक्ष्य में इस्लाम की शिक्षा का प्रसार करें।.. और वास्तव में भारत में मुसलमान ऐसी सर्वोत्तम इस्थिति में है कि वे मौजूदा प्ररिप्रेक्ष्य में इस्लाम की शिक्षा का प्रसार करें।.....पुरे विश्व में भारत ही ऐसा मुल्क है जहा हिन्दू मुसलमान सिख ईसाई सभी कौमी एकता की मिसाल पेश करते है.. यह सब इसी सनातन परंपरा का प्रभाव है... हा ये जो चोरो की फ़ौज बन रही है इसका कारण राजनितिक सत्ता की सर्वोच्चता का होना है.... विषय बहुत बढ़िया है ..... आपकी पोस्ट बेहद अच्छी लगी... यकीं मानिये हमारे आपके दिलो में जो प्रेम की लौ है वह इतनी आसानी से नहीं बुझेगी...उसमे आजादी में हम सभी ने बराबर का खून डाला है

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

राशिद भाई वंदेमातरम ! आप की यह पोस्ट पाखंडी धर्मनिरपेक्षवादियों के मुंह पर करारा तमाचा हैं जो सदियों से साथ रहते आये हिंदू मुसलमां को लड़ा कर अपनी रोटियां सेकते रहते हैं । अब जब दोनो पक्ष सुलह की बात करने जा रहे हैं तो सेकुलर मीडिया और धर्मनिरपेक्षता की तिजारत करने वालों को बवासीर हो गया है । अगर हिंदू मुसलमान आपस में सुलह कर लेते हैं तो उनकी वर्षों की धर्मनिरपेक्षता की चलती दुकान बंद हो जायेगी । कैसे कैसे बयान और तर्क दिये जा रहे हैं । लेकिन मुस्लिम समुदाय की तारीफ करनी होगी कि वह इन दलालों को माकूल जवाब भी दे रहा है । मैंने तो माननीय एस यू खान साहब के कोर्ट में जिरह भी की है । वह बेहद सुलझे हुये जज हैं । उनका यह कहना - श्भारतीय मुसलमान ऐसी सर्वोत्तम स्थिति में हैं कि वे मौजूदा प्ररिप्रेक्ष्य में इस्लाम की शिक्षा का प्रसार करें। उसकी सही स्थिति से लोगों को वाकिफ कराएं। भारतीय मुसलमान विश्व को इस्लाम का सही अर्थ बताने में सक्षम हैं।” न्यायमूर्ति खान के अनुसारए श्भारतीय मुसलमानों को विरासत में अथाह धार्मिक शिक्षा और ज्ञान मिला हुआ है। इसलिए वे दुनिया को यह बताने की बेहतर स्थिति में हैं कि इस्लाम की शिक्षा का असली मतलब क्या है और वर्तमान संदर्भ में उसे कैसे लागू किया जा सकता है। इसी क्रम में उन्होंने आगे कहा है कि पेश विवादित मामले को हल करने की दिशा में अपनी भूमिका से वे इस काम की शुरुआत कर सकते हैं !“ भारत के हिंदू और मुसलमानों के लिये प्रेम और शांति के नये दरवाजे खोलता है । इतनी बेहतरीन पोस्ट के लिये अगर आज आप मेरे करीब होते तो मैं आपको गले लगा लेता । इतनी सुलझी हुयी पोस्ट के लिये और पाखंडियों को आईना दिखाने के लिये आपका बहुत बहुत आभारी हूं ।

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मेरा व्यक्तिगत विश्वास है कि इस विचारधारा के मुस्लिम युवा न सिर्फ़ प्रगतिशील विचारों से ताल्लुक़ रखते हैं, बल्कि भारत के नवनिर्माण में प्राणपण से जुटे हुए भी हैं । देश के भविष्य युवा होते हैं, न कि वे चन्द मुट्ठी भर लोग, जिनसे पूर्वाग्रहग्रस्त नेता और मीडिया प्रभावित रहते हैं, और उन्हीं की सुनते और तरज़ीह देते आए हैं । जिस दिन राजनीति और मीडिया इस मुद्दे पर अपनी पुरानी सोच की केंचुली उतारकर नई दृष्टि से देखना शुरू कर देंगे, उसी दिन सारे विवादों सहित एकदूसरे के प्रति शंकाओं का भी पटाक्षेप हो जाएगा, हर विवादित मसले का हल भी खुले दिमाग से मिलबैठ कर तय होने लगेंगे, और लोगों को शायद आश्चर्य भी होगा कि इतने आसान सवालों को बेवजह क्यों कैंसर बनने दिया गया । पिछली गलतियां इतिहास ने अपनी परिस्थितियों के हिसाब से की थीं, आज की पीढ़ियां उन गलतियों की लाश अगर कंधे पर उठाए घूमती हैं, तो इसे बेवक़ूफ़ी से इतर कुछ नहीं कहा जा सकता । बस राजनीति अपने वोटबैंक, और मीडिया अपनी टीआरपी के लोभ से थोड़ा भी उपर उठ कर देखना समझना शुरू कर दें, सारी समस्याओं का अंत हो जाना है । अफ़सोस की बात है कि पिछले डेढ़ दशक से कार्यपालिका अपने अन्दर के भ्रष्टाचारी आचरण के कारण अकर्मण्य और नपुंसक हो चुकी है, और देश को चलाने और संतुलन स्थापित करने का कार्य न्यायपालिका को करना पड़ रहा है, जिसपर ये तोहमत है कि उसकी आंखों पर पट्टियां बंधी हैं । आज अगर हमारी न्यायपालिका जागरूक और उच्च दृष्टि वाली नहीं होती, तो देश इस वक़्त जल रहा होता रशीद जी, और बाहरी दुश्मन हमारी खिल्ली उड़ा रहे होते । अच्छी पोस्ट के लिये बधाई ।

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के द्वारा: Anuradha Chaudhary Anuradha Chaudhary

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राशिद भाई,एक सधी हुई सोच है आपकी,आम जनता तो उन्ही मुश्किलों से रोज दो-चार होती है चाहे हिन्दू हो या मुसलमान,वाकई हमारे तथाकथित राजनीतिक नेतृत्व ही हमारी सारी मुसीबतों के लिए जिम्मेदार है,चाहे वो राम-मंदिर वाले हों या सेकुलरवादी,न तो राम मंदिर वालों को आम जनता [हिन्दुओं जिनसे वो वोट चाहते हैं]की तकलीफें जैसे भूख,बेरोजगारी,अन्याय,दिखाई देती हैं और न ही वो जो सेकुलर होने के नाम पर मुसलामानों का सिर्फ शोषण करते आये हैं उन्होंने मुसलमानों का कोई भला किया है,गरीबी,अशिक्षा आदि समस्याएं मुसलामानों की कम नहीं हुई हैं,सही राजनीतिक नेतृत्व के अभाव के कारण हम आज़ादी के ६३ साल बाद भी अपनी मूल समस्याएं नहीं सुलझा पाए हैं, अब तो राशिद जी जनता ही सुधार सकती है व्यवस्था को चूँकि वोही भारत की मालिक है, वैसे भी इतिहास की थोड़ी भी जानकारी रखनेवाले जानते हैं की अंग्रेजों के पहले भारतीय राजनीति में फिरका-परस्ती नहीं रही,

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रशीद भाई बड़ी हैरत होती है जब ऐसे मुठ्ठी भर फसाद करने वाले लोग सिखों पर ऐसे ज़ुल्म करते हैं. और तो और यह अपने आपको और मुस्लिम समुदाय को भी बदनाम करते हैं. ऐसे लोगों का कभी भी समर्थन नहीं करना चाहिए बल्कि सारे देश के लोगों को इन लोगों की हरकत के खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए. यह ऐसा किसी भी लिहाज़ से नहीं कर सकते बल्कि सरासर नाजायज़ है. क्या ऐसे करके वोह उसके दिल में मुस्लिम के लिए प्यार पैदा कर सकते हैं? बिलकुल नहीं बल्कि नफरत पैदा कर रहे हैं. यह तो अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा ही काम है. ऐसे मुस्लिम कहलाने ( सिर्फ नाम के) वाले लोगों के खिलाफ सख्त करवाई होने चाहिए. ताकि उन्हें मालुम चले की किसी को सताने से कितनी तकलीफ होती है. और लोगों में सन्देश जाए की कमज़ोर हो या कम हो तो भी कोई उन्हें सताने का हक नहीं रखता. देश के लिए एकमत से समर्पित हूँ.

के द्वारा: jalal jalal

बहुत प्यारा लेख है रशीद भाई.... कुछ लोगो ने अपने हित के लिए हमको धर्मो में फिर धर्मों के अन्दर भी अलग अलग वर्गों में (हिन्दुओं में ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र में मुस्लिमो में शिया और सुन्नी में और भी लगभग सभी धर्मों में) बाट रखा है. जब तक हम बटे है इन लोगो के लिए काम के है जैसे ही हम समझे की हम एक है तो ये लोग बेकार हो जायेंगे. इस लिए इनका जोर बाटने में है.... और दुखद बात ये है की हम बाटने वालो से कमजोर है यद्यपि है नहीं पर मानसिक रूप से हम छोटे है इसलिए इनकी बातो में आकर हम खंडित होकर रह रहे हैं......... दोस्त बहुत अच्छा लेख है...... तुम्हारी शब्द यूँ ही सुन्दर लेखों में बदलते रहें ये खुदा से दुवा और भगवान् से प्रार्थना है............ मतलब दोनों का एक ही है................ चाहे राम कहो, या रहीम कहो, इंसान बस इंसान है................ तो भगवान् कैसे अलग हो सकता है............

के द्वारा: Piyush Pant Piyush Pant

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पवन जी ,, कमेन्ट के लिए शुक्रिया,, बात इंग्लैंड जाने या न जाने की नहीं है,, बात उस मानसिकता की है जो हमारे अन्दर पनप रही है वह मानसिकता है \\"गोरो की गुलामी\\" की मानसिकता,, आप देखे सब कुछ करने के बाद भी ज्यादा तर भारतीय इन गोरो को देख कर माई बाप करने लगते है,, अगर सब से अच्छा उदहारण देखना हो तो किसी ऐसी जगह जाये जहाँ गोरे और भारतीय एक स्थान पर हो आप देखे गे की सरकारी अधिकारी से लेकर पुलिस का सिपाही इन लोगो के आगे पीछे घूमता नज़र आये गा और दूसरी तरफ भारतीयों पर डंडा चलाते और गाली बकते नज़र आयेगे !! यह गुलाम मानसिकता इतनी हावी है की यूरोप से आने वाले विमान यात्रियों से भी \\"सर\\" करके बात की जाती है और खाड़ी देशो से आने वाले ग़रीब भारतीय श्रमिको से अपमानजनक रूप में बात की जाती है (कृपया मेरा लेख अप्रवासियो के दर्द देखे और उस पर धनाराम जी की टिप्पणी देखे !! जो शायद आप को रुला देगी)

के द्वारा: RASHID - Proud to be an INDIAN RASHID - Proud to be an INDIAN

राशिद जी, कातिलों और मकतूलों की सही तस्वीर प्रस्तुत करके आपने जो बात कही है उससे मैं पूरी तरह इत्तेफाक रखता हूँ| मैं खुद आज तक नहीं समझ पाया की कोई धर्म-विशेष कैसे आतंकवादी हो गया मुझे ऐतराज़ है हर उस बयान पर हर उस विचारक के विचार पर जी धर्म को संघर्ष या हिंसा के साथ जोड़ते हैं| गंदे इंसानी की गंदगी को धर्म के साथ जोड़ना आज इस कदर रिवाज़ बन चला है कि मुझे किसी भी धर्म से अलगाव महसूस होता है| दिल में जब ईश्वर का सम्मान और उसकी इज्ज़त नहीं तो क्यें धर्म की रत लगते हैं ये लोग सिर्फ हमारा खून पीने के लिए न| काश कि ये बात लोग समझ पाते| हमें भगवान् नहीं इंसान की ज्यादा जरूरत है| अच्छी पोस्ट पर बधाई!

के द्वारा: chaatak chaatak

सिंह साहब, आप की बात एकदम ठीक है, यही बात मैं भी कहना चाहता हूँ की कुछ भारतीय मुस्लमान क्यों किसी के बहकावे में आते है ,, इस्लाम का रूप तो भारत में आकर और खिला / निखरा है,, यह धरती तो सम्मानित है,, आज भी एक आम भारतीय मुस्लमान जितनी श्रध्दा और दिल से इस्लाम से जुड़ा है हर जगह ऐसा देखने को नहीं मिलता है !! मैं यह मानता हो की मुसलमानों की कुछ समस्याए है जैसे विकास की, यह भेदभाव की, उनको वोट बैंक समझने की, कट्टरपंथी तत्वों द्वारा निशाना बनाये जाने की लेकिन यह सब समस्याए मिलकर भी इतना नुकसान नहीं पहुचती जितना कुछ व्यक्तियों की आतंकवादी गतिविधिया !! हमको अपनी समस्याओ का हल ढूँढना चाहिए ना की उसको और बिगड़ना !!

के द्वारा: RASHID - Proud to be an INDIAN RASHID - Proud to be an INDIAN

रशीद भाई इराक को तो अमेरिका ने बर्बाद किया ही है. एक समय उसके दोस्त रहे अफगानिस्तान को हथियार देकर इसी ने दुश्मान बनाया है दुनिया के सामने. सारी दुनिया जानती है की इराक की लड़ाई की वजह क्या थी. बेशुमार तेल. झूठमूठ का हथियार होने का दावा किया और कुछ भी नहीं, मतलब एक हथियार भी नहीं निकला. दरअसल यह साजिश तकरीबन २० साल पहे ही रची गयी थी जिसे समय का इंतज़ार था बस. अभी अफगानिस्तान को बर्बाद कर रहा है. इस्रैल फिलिस्तीन को इन्होने ही लडवाया है. आज पाकिस्तान को मदद कर रहा है. लेकिन अमेरिकेन के ही एक बनाये मैप में पाकिस्तान नाम का कोई देश ही नहीं है. मतलब पकिस्तान भी जल्द ही जायेगा. अभी ऐश कर ले भले ही. भारत और दुसरे देश जो ऐसा होते सिर्फ देख रहे हैं और सोच रहे हैं वोह सुरक्षित हैं तो यह उनकी भारी ग़लतफ़हमी है. आज मेरी तो कल तेरी वाली ही बात है यहाँ पर. चीन, कोरिया और खिलाफ में खड़े होने वाले दुसरे देश अमेरिका के लिस्ट मिएँ हैं और होते जायेंगे. सबसे बड़ा आतंकवादी तो अमेरिका है है. और किसी न किसी तरीके से "america is bossing the world " पूरी दुनिया के देश को उसके और उसके जैसों के खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए. तभी कुछ हो सकता है.

के द्वारा: jalal jalal

राशिद जी, आपकी पोस्ट बड़े ही अच्छे ढंग से लिखी गई है जो सांप्रदायिक समरसता फैलाने में निःसंदेह कारगर है इस मुहिम को जारी रखिये ताकि लोगो के दिलों में बैठी कुंठा और बैर का भाव पिघल सके| यहाँ मैं एक बात और भी कहना चाहूंगा सिर्फ इस्लाम ही नहीं किसी भी धर्म का ध्येय तलवार के बल पर शाशन करना नहीं था न है बस कुछ लोग हैं जो हिंसक और आताताई रास्तो को धर्म के साथ जोड़ कर अपने निहित स्वार्थ की पूर्ती में तब भी थे और आज भी हैं| मैं किसी भी मजहब को मानने वालों का सम्मान करने का पक्षधर हूँ क्योंकि महत्वपूर्ण बात व्यक्ति का सम्मान है धर्म तो महज़ एक अफीम है या फिर उस डायनामाईट की तरह जिसका आविष्कार तो किया गया मानव की भलाई के लिए लेकिन ये मानवता के लिए ही चुनौती बन गई और इसने हित से अधिक अहित किया| धर्म के बारे में जो सबसे अच्छी बात की गई वो इकबाल साहब में कही थी- मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना हिंदी हैं हमवतन हैं, हिन्दोस्तां हमारा |

के द्वारा:

राशिद जी मैं भी आप की बात से पूर्णतया सहमत हूँ , अच्छे लेख पर बधाई ................ वास्तव में जो कुछ हम देख रहे हैं, मुद्रा, स्वार्थ, विलासिता, अकर्मण्यता और अंधनिष्ठा के अनियंत्रण , अन्धानुकरण का अपरोक्ष प्रतिफल है | मैं बस यही चाहूँगा की ये न ही किसी सभ्यता का भाग है, न ही हो सकता है | और इसके लिए कोई अकेला दोषी भी नहीं है, और कोई पूरा साफ़ भी नहीं है, क्योंकि अगर समाज मीडिया के इन प्रयाशो को एक शिरे से नकार दे तो क्या मीडिया अथवा कोई संस्था फिर ऐसा करेगी? वस्तुतः नहीं, किन्तु समाज के लोग स्वयं सुधर नहीं कर रहे हैं, जो चिंताजनक है | अगर हम ऐसे स्वयंबर धारावाहिकों को देकहना बंद कर दें तो क्या फिर ऐसे धारावाहिक आयेंगे | कुल मिलाकर हमें सुधर की सुरुआत नीव से ही करनी होगी ..............

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey Shailesh Kumar Pandey

राशीद जी ;            एक तथ्य बहुत प्रचलित है - " मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना " जहातक मै जनता हूँ इस्लाम का कोई दुश्मन नहीं है और रही बात आतंकवाद की, तो वो केवल इंसानियत का दुश्मन है। आतंकवाद के साथ इस्लाम का नाम बार बार इसलिए लिया जाता है क्योकि जब भी कोई आतंकवादी घटना घटती है तो उस घटना को अंजाम देने वालो में से अक्सर इस्लामिक होते है। हर धर्म का मकसद ही ये है की आपस में प्यार और भाई चारा बना रहे और इसको थोपा नही जा सकता जिसको जहाँ सुकून मिलेगा वह उसी धर्म का अनुयाई बन जायेगा। चाहे बाइबिल हो वेद हो या पुराण और या कुरान सबके कहने कां अर्थ एक ही है बस तरीका अलग अलग है। इस लिए मै यह कहना चाहूँगा की आतंकवाद इस्लाम का नहीं बल्कि पूरे समाज का दुश्मन है अतः यह कहना उचित ना होगा की आतंकवाद इस्लाम और मुसलमानों का असली दुश्मन है। कृपया मेरी बातो का बुरा ना मने क्योकि मुझे जो उचित लगा सो मैंने कह दिया।

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के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey Shailesh Kumar Pandey

के द्वारा: chaatak chaatak

के द्वारा: RASHID - Proud to be an INDIAN RASHID - Proud to be an INDIAN

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राशिद जी आपका लेख बहुत ही समसामयिक है। जिसे आज आनर किलिंग का नाम दिया जा रहा है वे हत्‍याये वास्‍तव मे सम्‍मान के लिये नही बल्कि अपनी जिद रखने के लिये की जाती है। आप अगर गम्‍भीरता से देखे तो पायेगे कि तथाकथित आनर किलिंग उस समाज मे व्‍याप्‍त एक मनोरोग है जो आज भी शैक्षिक और मानसिक रूप से पिछडा है। सगोत्रीय शादी प्रबिन्धित किया जाय या न इसका निर्णय समाज को नही बल्कि शादी करने वाले जोडे को करना चाहिए। आनुबंशिकी मे in breeding depression का एक सिद्धान्‍त है जिसमे समान गुणों वाले जोडों की शादी से उनकी संन्‍तानें कमजोर पैदा होती हैं। शायद इसी को ध्‍यान मे रख‍कर सगोत्रीय शादी प्रबिन्धित किया गया था। लेकिन इसका मतलब यह नही कि यदि किसी ने स्‍वेच्‍छा से शादी कर ली हो तो उसे रीति रिवाज के नाम पर मार दिया जाय। यह तो एक फासीवादी सोच है। आवश्‍यकता है वैचारिक बदलाव की।

के द्वारा: Anuradha Chaudhary Anuradha Chaudhary

के द्वारा: Anuradha Chaudhary Anuradha Chaudhary

जलाल भाई,मैं आपकी बात से सहमत हूँ,अपने संस्कार और तहज़ीब जातिके अन्दर और गोत्र से बाहर शादी की ताकीद करते हें और इन बातों के सामाजिक और आनुवंशिक कारण हें,बेशक इन मुद्दों का हल सामाजिक स्तर पर जागरूकता बढाकर बेहतर तरीके से पाया जा सकता है,और तथाकथित 'honour killings ' का भी समर्थन नहीं किया जा सकता है,इसके लिए सामाजिक प्रयास ही जरूरी हें कि कैसे अपने संस्कारों को सहेज कर रखते हुए भी हम तरक्की करके modern हो सकते हें,जापान का ही उदाहरण हमारे सामने है,"जिस पेड़ कि जड़ जितनी गहरी होंगी उतना ही ऊँचा वह पनप सकता है और मजबूती से खड़ा रह सकता है"लेकिन क्या modernity के नाम पर छिछोरेपन को जायज ठहराया जा सकता है?

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के द्वारा: RASHID - Proud to be an INDIAN RASHID - Proud to be an INDIAN

हाँ रशीद भाई आजकल ऐसा ही हो रहा है. जगह जगह ऐसे क़त्ल हो रहे हैं. कुछ हद तक सख्ती ठीक है लेकिन जान लेना बिलकुल ही गलत है. यह अधिकार किसी को नहीं है. माहौल को गन्दा करने की इजाजत नहीं दी जा सकती है लेकिन उसके लिए जान लेना उससे कहीं बड़ा अपराध है. रही विकसित लोगों वाली छवि यानी वेलेंटाइन डे जैसी चीज़ें मनाने का तो इसके लिए मैं भी सहमत नहीं हूँ. आज अगर आप देखें तो मालूम चलता हैं की भारतीय अब पश्चिमी देशों का अनुसरण करने लगा है. लेकिन ऐसी चीज़ें अपना कर कुछ फायदा नहीं है. बस नंगापन बढ़ रहा है और वोह दिन दूर नहीं जब सारे लोग यहाँ वहाँ नंगे या नंगे जैसे होंगे, अगर ऐसे ही हम उनकी चीज़े अपनाते रहे तो. अगर आप भविष्य में यह देखना चाहते हैं तो इसको होते रहने दें. और मुझे पूरा विश्वास है की यह नंगापन सब ओर दिखाई देगा. ऐसा पश्चिमी देशों में अभी से चालु हो चूका है. आपने शायद सूना होगा की शेर्लिन चोपड़ा ने नंगी फोटो शूट के लिए अमेरिकेन पत्रिका के ऑफर को स्वीकार किया है और इस पर भी वोह कहती है की वह भारतीय है. और तो और कुछ लोग तो यहाँ तक कहते हैं की वह खुशनसीब है जो ऑफर मिला. उसपर से चोपड़ा कहती है वह कम्फर्टेबल फील नहीं करेगी. अरे कम्फर्टेबल किया यह तो पूरा ही गलत है. क्या यह सब चारों ओर देख कर आप को अच्छा लगेगा? इसलिए संभालें इससे पहले की हालत बिगड़े. फिर मिलेंगे

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राशिद जी आपका ब्‍लाग देखकर मेरे आखों मे आसू आ गये। काश हमारे राजनीतिक नेताओं को सदबुद्धि आती। शाह फैसल वह युवा है जो न केवल मुस्लिम युवाओं का रोल माडल है बल्कि उन सभी भारतीय युवाओं का आदर्श है जो गरीबी और मजलूमियत को अपनी सफलता के आडे पा रहे थे। जब शाह फैसल जैसा युवा किसी काम के लिये ठान लेगा तो सफलता उसके कदम चूमेगी। रही बात मुसलमानों के देश भक्‍त होने का तो उस पर आम भारतीय को कोई शक नही है। यह दुश्‍प्रचार समाज मे फैले श्‍वार्थी लोगों का है। आम जनता इससे वाकिफ हो चुकी है। समय बदल रहा है राजनेताओं को भी उसके अनुसार बदलाव करना होगा अगर ऐसा नही होता है तो इतिहास उन्‍हे कभी माफ नही करेगा। बहुत अच्‍छा लिखते है लिखते रहिये। मेरी शुभकामना आपके साथ है।

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